Guru Granth Sahib Translation Project

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ਖੋਟੇ ਖਰੇ ਤੁਧੁ ਆਪਿ ਉਪਾਏ ॥ हे भगवान् ! आपने स्वयं ही बुरे एवं भले जीव उत्पन्न किए हैं।
ਤੁਧੁ ਆਪੇ ਪਰਖੇ ਲੋਕ ਸਬਾਏ ॥ समस्त लोगों के अच्छे एवं दुष्कर्मो की परख तू स्वयं ही करता है।
ਖਰੇ ਪਰਖਿ ਖਜਾਨੈ ਪਾਇਹਿ ਖੋਟੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਵਣਿਆ ॥੬॥ भले जीवों को तुम अपने भक्ति-कोष में डाल देते हो परन्तु बुरे जीवों को तुम भ्रम में फँसाकर कुमार्ग पर लगा देते हो।॥६॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਵੇਖਾ ਕਿਉ ਸਾਲਾਹੀ ॥ हे भगवान् ! मैं आपके दर्शन कैसे करूं ? और कैसे आपकी महिमा-स्तुति करूं ?
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਬਦਿ ਸਲਾਹੀ ॥ गुरु की कृपा से ही मैं वाणी द्वारा आपकी महिमा कर सकता हूँ!
ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਵਿਚਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਵਸੈ ਤੂੰ ਭਾਣੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆਵਣਿਆ ॥੭॥ हे प्रभु ! आपकी इच्छा से ही नाम-अमृत की वर्षा होती है और आप अपनी इच्छानुसार ही जीव को नाम-अमृत का पान करवाते हैं ॥७॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਬਦੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਹਰਿ ਬਾਣੀ ॥ हे भगवान् ! आपका नाम अमृत है और आपकी वाणी भी अमृत है।
ਸਤਿਗੁਰਿ ਸੇਵਿਐ ਰਿਦੈ ਸਮਾਣੀ ॥ सतगुरु की सेवा करने से ही आपकी वाणी मनुष्य के हृदय में समा जाती है।
ਨਾਨਕ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਪੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਭ ਭੁਖ ਲਹਿ ਜਾਵਣਿਆ ॥੮॥੧੫॥੧੬॥ हे नानक ! अमृत-नाम सदैव ही सुखदाता है और नाम रूपी अमृत का पान करने से मनुष्य की समस्त भूख मिट जाती है।॥८॥१५॥१६॥
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥ तीसरे गुरु द्वारा रचित, माझ राग में || ३ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਵਰਸੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥ नाम-अमृत सहज-स्वभाव ही बरस रहा है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਕੋਈ ਜਨੁ ਪਾਏ ॥ गुरु के माध्यम से इसे कोई विरला पुरुष ही इसे प्राप्त करता है।
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀ ਸਦਾ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੇ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੁਝਾਵਣਿਆ ॥੧॥ नाम-अमृत का पान करने वाले सदैव तृप्त रहते हैं। अपनी दया करके प्रभु उनकी प्यास बुझा देते हैं। ॥१ ॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆਵਣਿਆ ॥ मैं उन पर न्यौछावर हूँ, जिन्हें गुरु जी नाम अमृत का पान करवाते हैं।
ਰਸਨਾ ਰਸੁ ਚਾਖਿ ਸਦਾ ਰਹੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ਸਹਜੇ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ नाम अमृत को चखकर जिह्वा सदैव प्रभु की प्रीति में लीन रहती है और सहज ही हरि प्रभु का यशोगान करती है ॥१॥रहाउ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਹਜੁ ਕੋ ਪਾਏ ॥ गुरु की कृपा से कोई विरला प्राणी ही सहज अवस्था को प्राप्त करता है
ਦੁਬਿਧਾ ਮਾਰੇ ਇਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥ और अपनी दुविधा का नाश करके एक ईश्वर के साथ सुरति लगाता है।
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਤਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਨਦਰੀ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੨॥ जब परमात्मा दया-दृष्टि करता है तो प्राणी उस प्रभु का गुण-गान करता है और उसकी दया से सत्य में लीन हो जाता है।॥२॥
ਸਭਨਾ ਉਪਰਿ ਨਦਰਿ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ॥ हे मेरे हरि-प्रभु ! आपकी कृपा-दृष्टि इस संसार के समस्त जीवों पर है
ਕਿਸੈ ਥੋੜੀ ਕਿਸੈ ਹੈ ਘਣੇਰੀ ॥ किन्तु यह (कृपा-दृष्टि) किसी पर कम और किसी पर अधिकतर है।
ਤੁਝ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਕਿਛੁ ਨ ਹੋਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋਝੀ ਪਾਵਣਿਆ ॥੩॥ आपके सिवाय कुछ भी नहीं होता। इस बात का ज्ञान मनुष्य को गुरु के माध्यम से ही प्राप्त होता है॥३॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਤੁ ਹੈ ਬੀਚਾਰਾ ॥ गुरमुख इस तथ्य पर चिंतन करते हैं कि
ਅੰਮ੍ਰਿਤਿ ਭਰੇ ਤੇਰੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥ तेरे भण्डार नाम-अमृत से परिपूर्ण हैं।
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਕੋਈ ਨ ਪਾਵੈ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਪਾਵਣਿਆ ॥੪॥ सतगुरु की सेवा करने के अतिरिक्त कोई भी नाम अमृत को प्राप्त नहीं कर सकता। यह तो गुरु की दया से ही मिलता है।॥४॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੈ ਸੋ ਜਨੁ ਸੋਹੈ ॥ जो पुरुष सतगुरु की सेवा करता है, वह शोभनीय है।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮਿ ਅੰਤਰੁ ਮਨੁ ਮੋਹੈ ॥ प्रभु का अमृत-नाम मनुष्य के मन एवं हृदय को मोहित कर देता है।
ਅੰਮ੍ਰਿਤਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਬਾਣੀ ਰਤਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਹਜਿ ਸੁਣਾਵਣਿਆ ॥੫॥ जिनके मन एवं तन अमृत वाणी में मग्न हो जाते हैं, प्रभु उन्हें सहज ही अपना अमृत-नाम सुनाते हैं। ॥५॥
ਮਨਮੁਖੁ ਭੂਲਾ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਏ ॥ स्वेच्छाचारी जीव भटका हुआ है। और मोह-माया में फँसकर नष्ट हो जाता है।
ਨਾਮੁ ਨ ਲੇਵੈ ਮਰੈ ਬਿਖੁ ਖਾਏ ॥ प्रभु नाम का वह जाप नहीं करता और माया रूपी विष सेवन करके प्राण त्याग देता है।
ਅਨਦਿਨੁ ਸਦਾ ਵਿਸਟਾ ਮਹਿ ਵਾਸਾ ਬਿਨੁ ਸੇਵਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਵਣਿਆ ॥੬॥ रात-दिन उसका बसेरा सदैव विष्टा रूपी विषय-विकारों में रहता है। गुरु की सेवा के बिना वह अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ ही गंवा देता है॥६॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵੈ ਜਿਸ ਨੋ ਆਪਿ ਪੀਆਏ ॥ जिसको प्रभु स्वयं नाम रूपी अमृत पिलाते हैं केवल वहीं जीव इसका पान करता है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਹਜਿ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥ गुरु की कृपा से सहज ही वह परमात्मा में सुरति लगाता है।
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਸਭ ਆਪੇ ਗੁਰਮਤਿ ਨਦਰੀ ਆਵਣਿਆ ॥੭॥ पूर्ण परमेश्वर स्वयं ही सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है। गुरु की मति द्वारा वह प्रत्यक्ष दिखाई देता है। ७॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਸੋਈ ॥ वह निरंजन प्रभु सर्वत्र व्याप्त है।
ਜਿਨਿ ਸਿਰਜੀ ਤਿਨਿ ਆਪੇ ਗੋਈ ॥ जिस प्रभु ने सृष्टि की रचना की है, वह स्वयं ही इसका विनाश भी करता है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਸਦਾ ਤੂੰ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੮॥੧੬॥੧੭॥ हे नानक ! तुम सदैव ही प्रभु नाम का सिमरन करो। ऐसे तुम सहज ही परमात्मा में विलीन हो जाओगे ॥८॥१६॥१७॥
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥ तीसरे गुरु द्वारा रचित, माझ राग में || ३ ॥
ਸੇ ਸਚਿ ਲਾਗੇ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਏ ॥ हे ईश्वर ! जो आपको अच्छे लगते हैं, वहीं सत्य नाम में लगते हैं।
ਸਦਾ ਸਚੁ ਸੇਵਹਿ ਸਹਜ ਸੁਭਾਏ ॥ वह सहज-स्वभाव सदैव ही परमेश्वर की सेवा भक्ति करते हैं।
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਚਾ ਸਾਲਾਹੀ ਸਚੈ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੧॥ वह सत्य-नाम द्वारा सत्य-प्रभु की सराहना करते हैं और सत्य-नाम उन्हें सत्य से मिला देता है।॥१॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਸਚੁ ਸਾਲਾਹਣਿਆ ॥ मैं उन पर तन-मन से न्यौछावर हूँ, जो सत्य परमेश्वर की सराहना करते हैं।
ਸਚੁ ਧਿਆਇਨਿ ਸੇ ਸਚਿ ਰਾਤੇ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ जो सत्य परमेश्वर का ध्यान करते हैं, वह सत्य में ही रंग जाते हैं और सत्यवादी बन कर सत्य में लीन हो जाते हैं।॥१॥ रहाउ॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਸਚੁ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ॥ मैं जहाँ कहीं भी देखता हूँ, सत्य परमात्मा मुझे सर्वत्र दिखाई देता है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮੰਨਿ ਵਸਾਈ ॥ वह ईश्वर गुरु की कृपा से मनुष्य के मन में आकर निवास करता है।
ਤਨੁ ਸਚਾ ਰਸਨਾ ਸਚਿ ਰਾਤੀ ਸਚੁ ਸੁਣਿ ਆਖਿ ਵਖਾਨਣਿਆ ॥੨॥ फिर उस मनुष्य का शरीर शाश्वत हो जाता है और उसकी रसना सत्य में ही मग्न हो जाती है। वह मनुष्य सत्य नाम को सुनकर स्वयं भी मुँह से सत्य नाम ही बोलता है ॥२॥


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