Guru Granth Sahib Translation Project

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Page 118

ਹਰਿ ਚੇਤਹੁ ਅੰਤਿ ਹੋਇ ਸਖਾਈ ॥ भगवान् का भजन करते रहो, जो अंत में आपका सहायक बनेगा।
ਹਰਿ ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਅਨਾਥੁ ਅਜੋਨੀ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਇ ਪਾਵਣਿਆ ॥੧॥ भगवान अगम्य, अगोचर एवं अयोनि है, जिसका कोई भी स्वामी नहीं। ऐसे प्रभु को सतगुरु के प्रेम द्वारा ही पाया जाता है ॥१॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਆਪੁ ਨਿਵਾਰਣਿਆ ॥ मैं उन पर तन-मन से न्यौछावर हूँ, जो अपने अहंकार को दूर कर देते हैं।
ਆਪੁ ਗਵਾਏ ਤਾ ਹਰਿ ਪਾਏ ਹਰਿ ਸਿਉ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ जो व्यक्ति अपने अहंकार को छोड़ देता है, वह भगवान् को पा लेता है और सहज ही भगवान् में समा जाता है ॥१॥ रहाउ ॥
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਸੁ ਕਰਮੁ ਕਮਾਇਆ ॥ जीव वही कर्म करता है, जो उसकी किस्मत में पूर्व-जन्म के कर्मों पर आधारित लिखा जाता है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥ सतगुरु की सेवा से वह सदा सुख प्राप्त करता है।
ਬਿਨੁ ਭਾਗਾ ਗੁਰੁ ਪਾਈਐ ਨਾਹੀ ਸਬਦੈ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੨॥ भाग्य के बिना मनुष्य को गुरु नहीं मिलते, जो अपने वचनों के माध्यम से जीव को परमेश्वर से मिला देते हैं। ॥२॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਲਿਪਤੁ ਰਹੈ ਸੰਸਾਰੇ ॥ गुरमुख इस संसार में निर्लिप्त होकर रहता है।
ਗੁਰ ਕੈ ਤਕੀਐ ਨਾਮਿ ਅਧਾਰੇ ॥ यह केवल गुरु आश्रय एवं प्रभु नाम के साथ ही सम्भव है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋਰੁ ਕਰੇ ਕਿਆ ਤਿਸ ਨੋ ਆਪੇ ਖਪਿ ਦੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੩॥ जो गुरमुख है उसके साथ कौन अन्याय कर सकता है? जो भी प्रयास करेगा वह अपने आप ही कष्ट पाकर पीड़ा से तड़पेगा।॥३॥
ਮਨਮੁਖਿ ਅੰਧੇ ਸੁਧਿ ਨ ਕਾਈ ॥ ज्ञानहीन मनमुख को कोई ज्ञान नहीं होता।
ਆਤਮ ਘਾਤੀ ਹੈ ਜਗਤ ਕਸਾਈ ॥ वह आत्मघाती और संसार का जल्लाद है।
ਨਿੰਦਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਬਹੁ ਭਾਰੁ ਉਠਾਵੈ ਬਿਨੁ ਮਜੂਰੀ ਭਾਰੁ ਪਹੁਚਾਵਣਿਆ ॥੪॥ दूसरों की निंदा करके वह पापों का बोझ उठाता है। वह उस मजदूर जैसा है जो बिना मजदूरी लिए दूसरों का भार उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है॥४॥
ਇਹੁ ਜਗੁ ਵਾੜੀ ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਮਾਲੀ ॥ यह संसार एक उपवन है और मेरा प्रभु इसका बागबां है।
ਸਦਾ ਸਮਾਲੇ ਕੋ ਨਾਹੀ ਖਾਲੀ ॥ वह सदा ही इसकी रक्षा करता है। इसका कोई भाग उसकी देखरेख से अधूरा नहीं हुआ।
ਜੇਹੀ ਵਾਸਨਾ ਪਾਏ ਤੇਹੀ ਵਰਤੈ ਵਾਸੂ ਵਾਸੁ ਜਣਾਵਣਿਆ ॥੫॥ जिस तरह की महक ईश्वर पुष्प में डालता है, वह वैसी ही उसमें प्रबल होती है। सुगंधित पुष्प अपनी सुगंध से जाना जाता है॥५॥
ਮਨਮੁਖੁ ਰੋਗੀ ਹੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥ मनमुख प्राणी इस संसार में रोगग्रस्त रोगी है।
ਸੁਖਦਾਤਾ ਵਿਸਰਿਆ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥ उसने सुखदाता अगम्य व अनन्त प्रभु को विस्मृत कर दिया है।
ਦੁਖੀਏ ਨਿਤਿ ਫਿਰਹਿ ਬਿਲਲਾਦੇ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਾਂਤਿ ਨ ਪਾਵਣਿਆ ॥੬॥ मनमुख हमेशा ही दु:खी होकर रोते-चिल्लाते रहते हैं। गुरु के बिना उनको शांति प्राप्त नहीं होती।॥६॥
ਜਿਨਿ ਕੀਤੇ ਸੋਈ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥ जिस प्रभु ने उनकी सृजना की है, वह उनकी दशा को समझता है।
ਆਪਿ ਕਰੇ ਤਾ ਹੁਕਮਿ ਪਛਾਣੈ ॥ यदि प्रभु स्वयं दया करे, तभी मनुष्य उसकी आज्ञा को पहचानता है।
ਜੇਹਾ ਅੰਦਰਿ ਪਾਏ ਤੇਹਾ ਵਰਤੈ ਆਪੇ ਬਾਹਰਿ ਪਾਵਣਿਆ ॥੭॥ जिस तरह की बुद्धि ईश्वर प्राणी में डालता है, वैसे ही प्राणी कार्यरत होता है। परमात्मा स्वयं ही प्राणी को बाहर जगत् में जीवन-मार्ग पर लगाता है ॥७॥
ਤਿਸੁ ਬਾਝਹੁ ਸਚੇ ਮੈ ਹੋਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥ उस सत्यस्वरूप परमेश्वर के अतिरिक्त मैं अन्य किसी को भी नहीं जानता।
ਜਿਸੁ ਲਾਇ ਲਏ ਸੋ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਈ ॥ जिसको प्रभु अपनी भक्ति में लगाता है वह पवित्र हो जाता है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਜਿਸੁ ਦੇਵੈ ਸੋ ਪਾਵਣਿਆ ॥੮॥੧੪॥੧੫॥ हे नानक ! परमेश्वर का नाम मनुष्य के हृदय में निवास करता है। लेकिन जिसे प्रभु अपना नाम देता हैं, वही इसको प्राप्त करता है।॥८॥१४॥१५॥
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥ राग माझ, तीसरे गुरु द्वारा : ३ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥ जो व्यक्ति अमृत-नाम को अपने हृदय में बसा लेता है,
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਗਵਾਏ ॥ उसकी अहम् की भावना एवं समस्त दुःखों को नाश हो जाता है।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਸਦਾ ਸਲਾਹੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੧॥ वह अमृत-वाणी द्वारा सदैव ही भगवान् की महिमा-स्तुति करता रहता है और अमृत-वाणी द्वारा अमृत-नाम को पा लेता है॥१॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥ मैं उन पर तन-मन से न्यौछावर हूँ, जो अमृत वाणी को अपने हृदय में बसा लेते हैं।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ वह अमृत वाणी को अपने हृदय में बसाकर अमृत नाम का ध्यान करता रहता है।॥१॥ रहाउ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਬੋਲੈ ਸਦਾ ਮੁਖਿ ਵੈਣੀ ॥ वह अपने मुँह से वचनों द्वारा हमेशा ही अमृत-नाम बोलता रहता है
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਵੇਖੈ ਪਰਖੈ ਸਦਾ ਨੈਣੀ ॥ और अपनी आँखों से अमृत रूप परमात्मा को सर्वव्यापक देखता है एवं सत्य की परख करता रहता है।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕਥਾ ਕਹੈ ਸਦਾ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਅਵਰਾ ਆਖਿ ਸੁਨਾਵਣਿਆ ॥੨॥ वह सदैव ही दिन-रात हरि की अमृत कथा करता है तथा दूसरों को भी यह कथा बोलकर सुनाता है॥२॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰੰਗਿ ਰਤਾ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥ अमृत-नाम के प्रेम में मग्न हुआ व्यक्ति भगवान् में सुरति लगाता है
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਏ ॥ और यह अमृत-नाम उसे गुरु की कृपा से ही मिलता है।
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਰਸਨਾ ਬੋਲੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਮਨਿ ਤਨਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆਵਣਿਆ ॥੩॥ वह दिन-रात नाम-अमृत को अपनी रसना से बोलता रहता है और भगवान् उसे मन एवं तन द्वारा नाम-अमृत ही पान करवाता है॥३॥
ਸੋ ਕਿਛੁ ਕਰੈ ਜੁ ਚਿਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥ भगवान् वही कुछ करता है, जो मनुष्य की कल्पना में भी नहीं होता।
ਤਿਸ ਦਾ ਹੁਕਮੁ ਮੇਟਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਈ ॥ उसकी आज्ञा को कोई भी मिटा नहीं सकता।
ਹੁਕਮੇ ਵਰਤੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਹੁਕਮੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆਵਣਿਆ ॥੪॥ भगवान् की आज्ञा होने पर ही गुरु के माध्यम से जीवों को अमृत वाणी का पान करवाया जाता है। भगवान् अपनी आज्ञानुसार ही मनुष्य को नाम-अमृत का पान करवाता है॥४॥
ਅਜਬ ਕੰਮ ਕਰਤੇ ਹਰਿ ਕੇਰੇ ॥ हे सृजनहार परमेश्वर ! आपके कौतुक बड़े अदभुत हैं।
ਇਹੁ ਮਨੁ ਭੂਲਾ ਜਾਂਦਾ ਫੇਰੇ ॥ जब यह मन भटक जाता है तो आप ही उसे सन्मार्ग प्रदान करते हैं ।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਬਦਿ ਵਜਾਵਣਿਆ ॥੫॥ जब मनुष्य अमृत-वाणी में अपना चित्त लगाता है तो तू उसके अन्तर्मन में अमृत अनहद शब्द बजा देता है॥५॥


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