Hindi Page 506

ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹਿਰਦੈ ਪਵਿਤ੍ਰੁ ਪਾਵਨੁ ਇਹੁ ਸਰੀਰੁ ਤਉ ਸਰਣੀ ॥੭॥
हरि नामु हिरदै पवित्रु पावनु इहु सरीरु तउ सरणी ॥७॥
हे हरि ! मेरा यह शरीर तेरी शरण में है और तेरा पवित्र पावन नाम मेरे हृदय में बसता है ॥७ ॥

ਲਬ ਲੋਭ ਲਹਰਿ ਨਿਵਾਰਣੰ ਹਰਿ ਨਾਮ ਰਾਸਿ ਮਨੰ ॥
लब लोभ लहरि निवारणं हरि नाम रासि मनं ॥
हरि-नाम की पूँजी मन में आने से लोभ-लालच की लहरें नाश हो जाती हैं।

ਮਨੁ ਮਾਰਿ ਤੁਹੀ ਨਿਰੰਜਨਾ ਕਹੁ ਨਾਨਕਾ ਸਰਨੰ ॥੮॥੧॥੫॥
मनु मारि तुही निरंजना कहु नानका सरनं ॥८॥१॥५॥
गुरु नानक का कथन है कि हे निरंजन प्रभु ! मैं तेरी शरण में आया हूँ, तू ही मेरे मन को वशीभूत कर दे ॥८॥१॥५॥

ਗੂਜਰੀ ਮਹਲਾ ੩ ਘਰੁ ੧
गूजरी महला ३ घरु १
गूजरी महला ३ घरु १

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

ਨਿਰਤਿ ਕਰੀ ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਚਾਈ ॥
निरति करी इहु मनु नचाई ॥
मैं नृत्य करता हूँ परन्तु अपने इस मन को नचाता हूँ।

ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਆਪੁ ਗਵਾਈ ॥
गुर परसादी आपु गवाई ॥
गुरु की कृपा से मैंने अपना अहंकार मिटा दिया है।

ਚਿਤੁ ਥਿਰੁ ਰਾਖੈ ਸੋ ਮੁਕਤਿ ਹੋਵੈ ਜੋ ਇਛੀ ਸੋਈ ਫਲੁ ਪਾਈ ॥੧॥
चितु थिरु राखै सो मुकति होवै जो इछी सोई फलु पाई ॥१॥
जो अपने मन को हरि-चरणों में स्थिर रखता है, उसकी मुक्ति हो जाती है तथा जैसी इच्छा करता है, वैसा ही मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है॥ १॥

ਨਾਚੁ ਰੇ ਮਨ ਗੁਰ ਕੈ ਆਗੈ ॥
नाचु रे मन गुर कै आगै ॥
हे मन ! अपने गुरु के समक्ष श्रद्धा से नृत्य कर।

ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਨਾਚਹਿ ਤਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਅੰਤੇ ਜਮ ਭਉ ਭਾਗੈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
गुर कै भाणै नाचहि ता सुखु पावहि अंते जम भउ भागै ॥ रहाउ ॥
यदि तुम गुरु की रज़ा अनुसार नृत्य करो तो तुझे सुख की प्राप्ति होगी और अन्तिम समय मृत्यु का भय भी तुझ से भाग जाएगा॥ रहाउ॥

ਆਪਿ ਨਚਾਏ ਸੋ ਭਗਤੁ ਕਹੀਐ ਆਪਣਾ ਪਿਆਰੁ ਆਪਿ ਲਾਏ ॥
आपि नचाए सो भगतु कहीऐ आपणा पिआरु आपि लाए ॥
जिसे प्रभु स्वयं नचाता है, वही भक्त कहलवाता है। अपने प्रेम से प्रभु उसे स्वयं ही अपने चरणों में शरण देता है।

ਆਪੇ ਗਾਵੈ ਆਪਿ ਸੁਣਾਵੈ ਇਸੁ ਮਨ ਅੰਧੇ ਕਉ ਮਾਰਗਿ ਪਾਏ ॥੨॥
आपे गावै आपि सुणावै इसु मन अंधे कउ मारगि पाए ॥२॥
ईश्वर स्वयं ही गाता है और स्वयं ही सुनाता है तथा अन्धे ज्ञानहीन मन को सन्मार्ग पर लगाता है॥ २॥

ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਚੈ ਸਕਤਿ ਨਿਵਾਰੈ ਸਿਵ ਘਰਿ ਨੀਦ ਨ ਹੋਈ ॥
अनदिनु नाचै सकति निवारै सिव घरि नीद न होई ॥
जो दिन-रात नृत्य करता है और माया शक्ति पर अंकुश लगा देता है, वह प्रभु के मन्दिर में प्रविष्ट हो जाता है, जहाँ मोह-माया की निद्रा नहीं होती।

ਸਕਤੀ ਘਰਿ ਜਗਤੁ ਸੂਤਾ ਨਾਚੈ ਟਾਪੈ ਅਵਰੋ ਗਾਵੈ ਮਨਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥੩॥
सकती घरि जगतु सूता नाचै टापै अवरो गावै मनमुखि भगति न होई ॥३॥
माया के घर में सोया हुआ जगत नाचता-टापता एवं द्वैतवाद को गाता है। स्वेच्छाचारी पुरुष प्रभु-भक्ति नहीं कर सकता ॥३॥

ਸੁਰਿ ਨਰ ਵਿਰਤਿ ਪਖਿ ਕਰਮੀ ਨਾਚੇ ਮੁਨਿ ਜਨ ਗਿਆਨ ਬੀਚਾਰੀ ॥
सुरि नर विरति पखि करमी नाचे मुनि जन गिआन बीचारी ॥
देवते, मनुष्य, विरक्त, कर्मकाण्डी, मुनिजन, ज्ञानी तथा चिंतक भी ईश्वर की कृपा से नृत्य करते हैं।

ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਨਾਚੇ ਜਿਨ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੁਧਿ ਵੀਚਾਰੀ ॥੪॥
सिध साधिक लिव लागी नाचे जिन गुरमुखि बुधि वीचारी ॥४॥
सिद्ध, साधक पुरुष गुरु की शरणागत उत्तम बुद्धि प्राप्त करके विचारवान बन जाते हैं तथा प्रभु में सुरति लगाकर नृत्य करते हैं।॥४॥

ਖੰਡ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਨਾਚੇ ਜਿਨ ਲਾਗੀ ਹਰਿ ਲਿਵ ਤੁਮਾਰੀ ॥
खंड ब्रहमंड त्रै गुण नाचे जिन लागी हरि लिव तुमारी ॥
हे प्रभु ! खण्ड, ब्रह्माण्ड में रहने वाले त्रिगुणात्मक जीव जिन्होंने तेरे साथ ध्यान लगाया हुआ है, वे तेरी रज़ा में नृत्य कर रहे हैं।

ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭੇ ਹੀ ਨਾਚੇ ਨਾਚਹਿ ਖਾਣੀ ਚਾਰੀ ॥੫॥
जीअ जंत सभे ही नाचे नाचहि खाणी चारी ॥५॥
जीव-जन्तु एवं जीवन के चारों स्रोत प्रभु-इच्छा में नृत्य कर रहे हैं।॥ ५॥

ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵਹਿ ਸੇਈ ਨਾਚਹਿ ਜਿਨ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
जो तुधु भावहि सेई नाचहि जिन गुरमुखि सबदि लिव लाए ॥
हे प्रभु ! जो तुझे अच्छे लगते हैं केवल वही नाचते हैं तथा जो गुरुमुख शब्द से ध्यान लगाते हैं, वह भी क्रियाशील हैं।

ਸੇ ਭਗਤ ਸੇ ਤਤੁ ਗਿਆਨੀ ਜਿਨ ਕਉ ਹੁਕਮੁ ਮਨਾਏ ॥੬॥
से भगत से ततु गिआनी जिन कउ हुकमु मनाए ॥६॥
जिन से प्रभु अपने हुक्म की पालना करवाता है वही भक्त एवं तत्व ज्ञानी है॥ ६॥

ਏਹਾ ਭਗਤਿ ਸਚੇ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਗੈ ਬਿਨੁ ਸੇਵਾ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
एहा भगति सचे सिउ लिव लागै बिनु सेवा भगति न होई ॥
यही भक्ति है कि मनुष्य प्रभु में ध्यान लगाए। सेवा के बिना भक्ति नहीं हो सकती।

ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਤਾ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰੈ ਤਾ ਸਚੁ ਪਾਵੈ ਕੋਈ ॥੭॥
जीवतु मरै ता सबदु बीचारै ता सचु पावै कोई ॥७॥
जब मनुष्य सांसारिक कार्य करता हुआ माया के मोह से मर जाए तो वह गुर-शब्द का चिन्तन करता है तथा तब वह सत्य को प्राप्त कर सकता है॥ ७॥

ਮਾਇਆ ਕੈ ਅਰਥਿ ਬਹੁਤੁ ਲੋਕ ਨਾਚੇ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੀ ॥
माइआ कै अरथि बहुतु लोक नाचे को विरला ततु बीचारी ॥
धन-दौलत की प्राप्ति हेतु बहुत सारे लोग नाचते हैं। लेकिन कोई विरला पुरुष ही तत्व ज्ञान का बोध करता है।

ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਏ ਜਿਨ ਕਉ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੁਮਾਰੀ ॥੮॥
गुर परसादी सोई जनु पाए जिन कउ क्रिपा तुमारी ॥८॥
हे स्वामी ! जिस मनुष्य पर तुम कृपा-दृष्टि करते हो, वह गुरु की दया से तुझे पा लेता है॥ ८॥

ਇਕੁ ਦਮੁ ਸਾਚਾ ਵੀਸਰੈ ਸਾ ਵੇਲਾ ਬਿਰਥਾ ਜਾਇ ॥
इकु दमु साचा वीसरै सा वेला बिरथा जाइ ॥
यदि मैं एक क्षण भर भी सत्य (परमात्मा) को विस्मृत करूँ तो वह समय व्यर्थ बीत जाता है।

ਸਾਹਿ ਸਾਹਿ ਸਦਾ ਸਮਾਲੀਐ ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਕਰੇ ਰਜਾਇ ॥੯॥
साहि साहि सदा समालीऐ आपे बखसे करे रजाइ ॥९॥
हे भाई ! प्रत्येक श्वास से तू सदा प्रभु को हृदय में धारण कर, वह अपनी इच्छानुसार तुझे स्वयं ही क्षमा कर देगा ॥९॥

ਸੇਈ ਨਾਚਹਿ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵਹਿ ਜਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੀ ॥
सेई नाचहि जो तुधु भावहि जि गुरमुखि सबदु वीचारी ॥
हे प्रभु ! केवल वही नाचते हैं जो तुझे अच्छे लगते हैं और जो गुरुमुख बनकर शब्द का चिन्तन करते हैं।

ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੇ ਸਹਜ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਜਿਨ ਕਉ ਨਦਰਿ ਤੁਮਾਰੀ ॥੧੦॥੧॥੬॥
कहु नानक से सहज सुखु पावहि जिन कउ नदरि तुमारी ॥१०॥१॥६॥
नानक का कथन है कि हे प्रभु ! जिन पर तुम्हारी दया-दृष्टि है, असल में वही सहजता से आत्मिक सुख की अनुभूति करते हैं।॥ १०॥ १॥ ६॥

ਗੂਜਰੀ ਮਹਲਾ ੪ ਘਰੁ ੨
गूजरी महला ४ घरु २
गूजरी महला ४ घरु २

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਜੀਅਰਾ ਰਹਿ ਨ ਸਕੈ ਜਿਉ ਬਾਲਕੁ ਖੀਰ ਅਧਾਰੀ ॥
हरि बिनु जीअरा रहि न सकै जिउ बालकु खीर अधारी ॥
भगवान के बिना मेरा यह मन (जीवित) रह नहीं सकता, जैसे दूध के आधार पर रहने वाला बालक दूध के बिना नहीं रह सकता।

ਅਗਮ ਅਗੋਚਰ ਪ੍ਰਭੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਅਪੁਨੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥੧॥
अगम अगोचर प्रभु गुरमुखि पाईऐ अपुने सतिगुर कै बलिहारी ॥१॥
अगम्य, अगोचर प्रभु गुरु के माध्यम से ही पाया जा सकता है। इसलिए मैं अपने सतिगुरु पर बलिहारी जाता हूँ॥ १॥

ਮਨ ਰੇ ਹਰਿ ਕੀਰਤਿ ਤਰੁ ਤਾਰੀ ॥
मन रे हरि कीरति तरु तारी ॥
हे मन ! हरि की यश-कीर्ति संसार-सागर से पार होने के लिए एक जहाज है।

ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਜਲੁ ਪਾਈਐ ਜਿਨ ਕਉ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੁਮਾਰੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरमुखि नामु अम्रित जलु पाईऐ जिन कउ क्रिपा तुमारी ॥ रहाउ ॥
हे प्रभु ! जिन पर तुम्हारी कृपा-दृष्टि होती है, वह गुरु की शरण में नाम रूपी अमृत-जल को प्राप्त कर लेते हैं। रहाउ॥

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